बीजिंग: वैश्विक खाद्य और उर्वरक संकट के बीच चीन एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय निशाने पर आ गया है। वर्ल्ड बैंक के पूर्व अध्यक्ष David Malpass ने चीन पर खाद्य पदार्थों और उर्वरकों की जमाखोरी का आरोप लगाते हुए कहा है कि बीजिंग को तुरंत अपने भंडार बढ़ाना बंद करना चाहिए। उनका कहना है कि चीन की इस नीति से पूरी दुनिया की सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ रहा है।

मालपास ने BBC वर्ल्ड सर्विस के कार्यक्रम ‘वर्ल्ड बिजनेस Report’ में कहा कि चीन के पास पहले से ही दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य और उर्वरक स्टॉक मौजूद है। इसके बावजूद वह लगातार भंडारण बढ़ा रहा है, जिससे कई देशों में उर्वरकों की कमी पैदा हो रही है।
ईरान युद्ध और होर्मुज संकट से बढ़ी परेशानी
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट ने हालात और खराब कर दिए हैं। उर्वरकों की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है और कई देश खेती के मौसम से पहले जरूरी स्टॉक जुटाने में लगे हैं। इसी बीच चीन ने मार्च से कई प्रकार के उर्वरकों के निर्यात पर रोक लगा दी है।
चीन का कहना है कि यह फैसला घरेलू जरूरतों को सुरक्षित रखने के लिए लिया गया है, लेकिन आलोचकों का आरोप है कि बीजिंग वैश्विक संकट के समय अपने हितों को प्राथमिकता दे रहा है।
चीन के ‘विकासशील देश’ वाले दावे पर भी सवाल
डेविड मालपास ने चीन के खुद को “विकासशील देश” बताने पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और कई मामलों में बेहद समृद्ध देश बन चुका है। इसके बावजूद वह WTO और वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाओं में विकासशील देश का दर्जा लेकर विशेष लाभ उठाता है।
चीन ने आरोपों को किया खारिज
वॉशिंगटन स्थित चीनी दूतावास के प्रवक्ता Liu Pengyu ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि चीन वैश्विक खाद्य और उर्वरक बाजार को स्थिर बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि सप्लाई चेन संकट के असली कारण सभी जानते हैं और इसका दोष चीन पर नहीं डाला जा सकता।
होर्मुज पर नियंत्रण से चीन को भी होगा नुकसान
मालपास ने चेतावनी दी कि अगर ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण मजबूत करता है तो इसका नुकसान चीन को भी उठाना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि चीन वैश्विक व्यापार, शिपिंग और कंटेनर नेटवर्क से भारी मुनाफा कमाता है, इसलिए खुले समुद्री रास्ते उसके लिए बेहद जरूरी हैं।
Awaz Plus के लिए यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि इसका असर आने वाले समय में खाद्य कीमतों, खेती और वैश्विक व्यापार पर सीधे तौर पर पड़ सकता है।
