लखनऊ/नई दिल्ली: हर साल बढ़ती गर्मी अब सिर्फ एक मौसमी शिकायत नहीं रह गई है, बल्कि यह वैश्विक संकट का संकेत बन चुकी है। वर्ष 2026 के पृथ्वी दिवस के अवसर पर वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि वर्तमान रफ्तार से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन जारी रहा, तो आने वाले 20 वर्षों में पृथ्वी का तापमान खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है।

Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पृथ्वी पहले ही औद्योगिक युग से पहले के स्तर की तुलना में लगभग 1.2 से 1.3 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो चुकी है। मौजूदा रुझानों को देखते हुए 2045–2050 तक इसमें 0.3 से 0.6 डिग्री सेल्सियस की और वृद्धि संभव है। यानी वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तक पहुंच सकता है, जिसे वैज्ञानिक “खतरनाक सीमा” मानते हैं।
वहीं World Meteorological Organization (WMO) के अनुसार वर्तमान में पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 14–15 डिग्री सेल्सियस है, जो 2046 तक बढ़कर 15.5 से 15.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है।
मानव जीवन पर बढ़ता खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि तापमान में यह वृद्धि सीधे मानव जीवन को प्रभावित करेगी। भीषण गर्मी और लू की घटनाएं तेजी से बढ़ेंगी, जिससे बच्चों, बुजुर्गों और मजदूर वर्ग के लिए स्वास्थ्य जोखिम गंभीर हो जाएगा। हीट स्ट्रोक, सांस संबंधी बीमारियां और संक्रामक रोगों में वृद्धि की आशंका जताई गई है।
पानी और खेती पर संकट
बढ़ती गर्मी के कारण कई क्षेत्रों में सूखा और जल संकट गहराने की संभावना है। इससे खेती प्रभावित होगी और खाद्य उत्पादन में गिरावट आ सकती है, जिसका असर महंगाई और खाद्य सुरक्षा पर पड़ेगा।
समुद्र स्तर में वृद्धि
वैज्ञानिकों के मुताबिक अगले दो दशकों में समुद्र का स्तर 10 से 20 सेंटीमीटर तक बढ़ सकता है। इससे तटीय क्षेत्रों में बाढ़, भूमि क्षरण और विस्थापन का खतरा बढ़ेगा।
बीमारियों का फैलाव बढ़ेगा
गर्मी बढ़ने से मच्छरों और अन्य कीटों का दायरा बढ़ेगा, जिससे डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियों के मामले तेजी से बढ़ सकते हैं।
समाधान की दिशा में जरूरी कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट से बचने के लिए तुरंत ठोस कदम उठाने होंगे। कार्बन उत्सर्जन में कमी, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा, वृक्षारोपण और हरित क्षेत्रों का विस्तार बेहद जरूरी है।
पृथ्वी दिवस 2026 सिर्फ एक प्रतीकात्मक दिन नहीं, बल्कि चेतावनी है कि यदि अभी भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना करना पड़ेगा।
