लखनऊ | आवाज़ प्लस न्यूज़
भारतीय मनोरंजन जगत में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जो अपनी अदाकारी से हर किरदार को जीवंत कर देते हैं। ऐसे ही दिग्गज कलाकार थे सलीम घोष, जिन्होंने अपने अभिनय से 90 के दशक में खास पहचान बनाई। उनकी गहरी आवाज़, सधी हुई डायलॉग डिलीवरी और दमदार स्क्रीन प्रेज़ेंस ने उन्हें एक अलग मुकाम दिया।

शुरुआत से ही अभिनय का जुनून
10 जनवरी 1952 को चेन्नई में जन्मे सलीम घोष ने अभिनय की पढ़ाई भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान (FTII) से की। यहां से प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने रंगमंच और फिल्मों में कदम रखा। 1978 में फिल्म ‘स्वर्ग नरक’ से अपने करियर की शुरुआत करने वाले घोष ने ‘सारांश’ और ‘मोहन जोशी हाजिर हो!’ जैसी फिल्मों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
एक शो में तीन ऐतिहासिक किरदार
दूरदर्शन के चर्चित धारावाहिक भारत एक खोज में सलीम घोष ने अद्भुत अभिनय का प्रदर्शन किया। इस एक ही शो में उन्होंने भगवान राम, भगवान कृष्ण और टीपू सुल्तान जैसे तीन अलग-अलग और प्रभावशाली किरदार निभाए।
जहां राम के रूप में उन्होंने मर्यादा और संतुलन दिखाया, वहीं कृष्ण के रूप में दार्शनिक गहराई और टीपू सुल्तान के रूप में शौर्य और नेतृत्व का दमदार चित्रण किया।
खलनायक के रूप में भी बनाई पहचान
पौराणिक और ऐतिहासिक भूमिकाओं के अलावा सलीम घोष ने बॉलीवुड में खलनायक के तौर पर भी मजबूत पहचान बनाई। 1997 में रिलीज हुई फिल्म कोयला में उनका नकारात्मक किरदार दर्शकों के बीच काफी चर्चित रहा। उन्होंने हिंदी के अलावा तमिल, तेलुगु और मलयालम फिल्मों में भी शानदार अभिनय किया।
फिल्म जगत को बड़ी क्षति
28 अप्रैल 2022 को सलीम घोष का निधन हो गया, जिससे भारतीय सिनेमा को अपूरणीय क्षति पहुंची। हालांकि आज वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा निभाए गए किरदार और उनकी दमदार आवाज़ आज भी दर्शकों के दिलों में जीवित हैं।
सलीम घोष ने यह साबित किया कि एक सच्चा कलाकार किसी एक छवि में सीमित नहीं रहता। वह हर किरदार में खुद को ढालकर उसे अमर बना सकता है। उनका योगदान भारतीय सिनेमा और टेलीविजन इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा।
