कौन बचा रहा भ्रष्टाचार?— अवर अभियंता आशुतोष का निलंबन खोलता है सिस्टम की पोल

कौन बचा रहा भ्रष्टाचार? — अवर अभियंता आशुतोष का निलंबन लखनऊ ऊर्जा विभाग की पोल खोलता है

ईमानदारी की सज़ा और भ्रष्टाचार की सुरक्षा — यूपी के ऊर्जा विभाग में नियम नहीं, रिश्ते काम आते हैं

लखनऊ।
उत्तर प्रदेश के ऊर्जा विभाग में एक बार फिर वही पुराना सच उजागर हुआ है — “जो नियमों पर चलेगा, वही सबसे पहले निशाने पर आएगा।”
29 सितंबर 2025 को विभाग द्वारा जारी निलंबन आदेश ने यह साफ़ कर दिया कि यहां ईमानदारी को सम्मान नहीं, बल्कि सज़ा मिलती है।
मामला लखनऊ ग्रामीण विद्युत वितरण मंडल के अवर अभियंता आशुतोष कुमार का है, जिन्हें एक उपभोक्ता शिकायत के बहाने निलंबित कर दिया गया।

परंतु दस्तावेज़ों और सूत्रों की मानें तो यह पूरा मामला तकनीकी “लापरवाही” से ज़्यादा अंदरूनी राजनीति और विभागीय दबाव का परिणाम है।
कई वर्षों से विभाग में व्याप्त भ्रष्ट नेटवर्क और दलाल तंत्र के बीच आशुतोष कुमार जैसे अधिकारी, जो सीधे-सादे और पारदर्शी तरीके से काम करते हैं, उन पर अक्सर “उदाहरण बनाने” का दबाव बनाया जाता है।

⚡ “सच्चाई बोलने की कीमत —

इस पूरे विवाद की जड़ एक उपभोक्ता श्रीमती कुंती देवी (ग्राम खटोला, तहसील सरोजनी नगर) के विद्युत संयोजन आवेदन से जुड़ी है।
जानकारी के अनुसार, उपभोक्ता ने लगभग 120 मीटर दूरी पर कनेक्शन के लिए आवेदन किया था।
प्रारंभिक स्टीमेंट तैयार होने के बाद पड़ोसी ने आपत्ति दर्ज कराई — जिसके बाद उपभोक्ता ने नया स्टीमेंट बनाने के लिए आवेदन दिया।
यहीं से विवाद शुरू हुआ।

विभागीय सूत्रों का कहना है कि वह दूसरा आवेदन पत्र जानबूझकर फाड़ दिया गया ताकि कनेक्शन प्रक्रिया में देरी हो और बाद में “मैनेजमेंट फीस” के नाम पर वसूली की जा सके।
जब आशुतोष कुमार ने इस प्रक्रिया पर आपत्ति जताई और मौखिक आदेशों को लिखित रूप में लाने की मांग की, तो वरिष्ठ अधिकारियों की नाराज़गी झेलनी पड़ी।
अंततः 18 सितंबर को शुरू हुआ विवाद 29 सितंबर को उनके निलंबन आदेश तक जा पहुंचा।

🕳️ विभागीय मिलीभगत और मीडिया मैनेजमेंट की कहानी

जिन दस्तावेज़ों के आधार पर यह कार्रवाई की गई, वे स्वयं कई सवाल खड़े करते हैं।
न तो कोई तकनीकी जांच हुई, न ही अभियंता को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया।
उल्टा, सूत्रों के अनुसार, एक अन्य अवर अभियंता और कुछ स्थानीय पत्रकारों की मिलीभगत से उनके खिलाफ झूठी खबरें चलवाई गईं — ताकि विभाग पर कार्रवाई का दबाव बनाया जा सके।

यह वही पत्रकार है, जो हाल ही में अपने विवादित बयान “चांदी की जूता, वह रावण होता” जैसे शब्दों के कारण चर्चा में आया था।
इस व्यक्ति के विभागीय अधिकारियों से आर्थिक लेन-देन के साक्ष्य भी सूत्रों ने उजागर किए हैं।

💡 “भ्रष्ट बच गए, ईमानदार सस्पेंड”

लखनऊ ग्रामीण विद्युत वितरण मंडल में यह पहला मामला नहीं है, जब किसी ईमानदार कर्मचारी को बलि का बकरा बनाया गया हो।
सूत्र बताते हैं कि जिन लाइनमैन और संविदा कर्मचारियों पर पहले भी रिश्वत और अवैध कनेक्शन देने के आरोप लगे थे,
वे आज भी उसी पद पर हैं — जबकि जो अधिकारी नियमों का पालन कर रहा था, उसे सस्पेंड कर दिया गया।

यह सवाल खड़ा करता है कि क्या ऊर्जा विभाग में अब “भ्रष्टाचार की सुरक्षा नीति” लागू हो चुकी है?
क्या विभागीय उच्च अधिकारी खुद इन नेटवर्कों के संरक्षक बन चुके हैं?

📣 जनता और सहयोगियों का आक्रोश

स्थानीय तकनीकी कर्मचारियों और उपभोक्ताओं ने इस कार्रवाई की निंदा की है।
कई लोगों ने कहा —

“आशुतोष कुमार जैसे अधिकारी बहुत कम हैं जो बिना कमीशन के काम करते हैं। अगर ऐसे लोगों को ही सस्पेंड कर दिया जाएगा, तो बाकी लोग तो पूरी तरह सिस्टम के हवाले हो जाएंगे।”

जनता में गुस्सा है कि विभाग ने यह स्पष्ट नहीं किया कि उपभोक्ता का दूसरा आवेदन क्यों नज़रअंदाज़ किया गया और क्यों केवल एक व्यक्ति पर पूरा दोष थोप दिया गया।

⚖️ क्या होगी न्यायिक समीक्षा?

अब सवाल यह है कि क्या यह निलंबन वास्तविक तथ्यों पर आधारित है या यह सिर्फ़ एक विभागीय ‘साजिश’ है?
ऊर्जा मंत्री और एमडी एमवीवीएनएल से यह उम्मीद की जा रही है कि वे इस मामले में स्वतंत्र जांच कराएं, ताकि
यह साबित हो सके कि सच्चाई बोलने वाला अफसर अपराधी नहीं होता।

🔍 निष्कर्ष:

यह मामला सिर्फ़ एक अभियंता के निलंबन का नहीं,
बल्कि उस व्यवस्था के पतन का प्रतीक है जहां “भ्रष्टाचार संगठन है और ईमानदारी विरोध।”

सवाल सिर्फ़ इतना है —
क्या सच बोलने वाला सिस्टम में टिक सकता है?
या फिर,
हर बार बलि का बकरा वही बनेगा जो नियमों की बात करता है?

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