उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में त्रिपुरा के एक छात्र की कथित नस्लीय भेदभाव के चलते हुई हत्या के मामले ने अब राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर रूप ले लिया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इस पूरे मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए देहरादून के जिलाधिकारी (DM) और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को नोटिस जारी किया है। आयोग ने दोनों अधिकारियों से सात दिनों के भीतर विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट तलब की है।
नस्लीय भेदभाव के आरोपों पर NHRC सख्त
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को त्रिपुरा के छात्र की हत्या से संबंधित एक शिकायत प्राप्त हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि छात्र पर नस्लीय टिप्पणियां की गईं और इसी भेदभाव के चलते उसकी निर्मम हत्या कर दी गई। शिकायत पर गंभीरता दिखाते हुए NHRC ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 12 के तहत मामले का संज्ञान लिया।
आयोग की पीठ, जिसकी अध्यक्षता सदस्य प्रियंक कानूनगो कर रहे थे, ने कहा कि शिकायत में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया पीड़ित के मानवाधिकारों के उल्लंघन की ओर इशारा करते हैं। इसे देखते हुए आयोग ने प्रशासन से तत्काल रिपोर्ट मांगी है।
डीएम और एसएसपी को सात दिन का समय
NHRC ने देहरादून के जिलाधिकारी और एसएसपी को निर्देश दिया है कि वे पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर सात दिनों के भीतर आयोग को कार्रवाई रिपोर्ट सौंपें। इसके साथ ही आयोग ने यह भी कहा है कि इस रिपोर्ट की एक प्रति उत्तराखंड के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) को भी जानकारी के लिए भेजी जाए।
पूर्वोत्तर के छात्रों की सुरक्षा पर विशेष निर्देश
आयोग ने केवल इस मामले तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि राज्य प्रशासन को यह भी निर्देश दिया कि उत्तराखंड में पढ़ाई कर रहे पूर्वोत्तर राज्यों के छात्रों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता पर सुनिश्चित की जाए। आयोग ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकार का नस्लीय भेदभाव या हिंसा मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है और इसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
क्या है पूरा मामला
जानकारी के अनुसार, देहरादून के एक निजी विश्वविद्यालय में एमबीए के अंतिम वर्ष का छात्र अंजेल चकमा (24 वर्ष), निवासी त्रिपुरा, पर 9 दिसंबर को कुछ युवकों ने कथित तौर पर चाकू और ब्रेसलेट से हमला कर दिया था। आरोप है कि हमले के दौरान छात्र के खिलाफ नस्लीय टिप्पणियां भी की गईं।
गंभीर रूप से घायल अंजेल चकमा को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां वह करीब 17 दिनों तक जिंदगी और मौत के बीच जूझता रहा। इलाज के दौरान 26 दिसंबर को उसकी मौत हो गई। इस घटना के बाद से पूर्वोत्तर के छात्रों में भय और आक्रोश का माहौल है।
मानवाधिकार और सामाजिक सवाल
यह मामला न केवल कानून-व्यवस्था बल्कि सामाजिक सोच पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। देश के अलग-अलग हिस्सों से पढ़ाई के लिए आने वाले छात्रों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। नस्लीय टिप्पणियों और हिंसा जैसी घटनाएं भारत की एकता और विविधता की भावना को ठेस पहुंचाती हैं।
अब सबकी नजर कार्रवाई रिपोर्ट पर
अब सभी की निगाहें देहरादून प्रशासन की रिपोर्ट और आगे की कार्रवाई पर टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि क्या दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाते हैं और क्या पूर्वोत्तर के छात्रों की सुरक्षा को लेकर ठोस उपाय किए जाते हैं।
