लखनऊ कमिश्नरेट के जानकीपुरम क्षेत्र में सामने आया ताज़ा मामला पुलिसिया अधिकारों की मनमानी व्याख्या और वर्दी के दुरुपयोग की खतरनाक तस्वीर पेश करता है।

सबसे बड़ा और सीधा सवाल यही है—
क्या हर सिपाही को यह खुली छूट दे दी गई है कि वह किसी भी वाहन का, कहीं भी, कभी भी, बिना बाधा और बिना जवाबदेही के ऑनलाइन चालान ठोक दे?
- यदि जवाब “हाँ” है, तो फिर नियम-कानून, आदेश-पत्र, अधिकृत लॉग-इन और ड्यूटी चार्ट किस काम के हैं?
- और यदि जवाब “नहीं” है, तो जानकीपुरम में हुआ यह चालान किस अधिकार, किस आदेश और किस सिस्टम के तहत किया गया?
रविवार को आवश्यक सेवा—बिजली—से जुड़े एक अधिशासी अभियंता शिकायत के निवारण के लिए पहुँचे थे। न यातायात बाधित था, न कोई जाम, न किसी नागरिक को असुविधा। इसके बावजूद मौके पर मौजूद जिसने अपना नाम मनीष कुमार चौहान बताया—तुरंत सामने आ गया और बोला:
“गलत पार्किंग है, चालान कर रहा हूँ – Violation of Parking Rules MV Act 1988 – धारा 122, 126 r/w 177 का हवाला देकर ऑनलाइन चालान कर दिया। यह कार्रवाई नियम पालन कम और अधिकार प्रदर्शन अधिक प्रतीत होती है।
और सवाल यहीं खत्म नहीं होते?
जब अधिकारी ने अपनी मजबूरी और आवश्यक सेवा का हवाला दिया, तो समझाइश के बजाय शारीरिक स्पर्श और दबाव का रास्ता अपनाया गया। क्या यही उत्तर प्रदेश पुलिस का प्रशिक्षण है? क्या यही “जनसेवा” की परिभाषा है?
विडंबना यह है कि जिस थाने में एक आम नागरिक की पारिवारिक शिकायत एक महीने से अधिक समय से लंबित पड़ी है, उसी थाने के सामने एक सिपाही मिनटों में चालान काट देता है।
यह तेज़ न्याय नहीं, बल्कि चयनात्मक कार्रवाई है।

आवाज़ प्लस मांग करता है कि संबंधित सिपाही की ड्यूटी, अधिकार और चालान की वैधता की सार्वजनिक जांच हो, कथित दुर्व्यवहार पर विभागीय कार्रवाई की जाए, लंबित शिकायत पर अब तक कार्रवाई न होने का स्पष्टीकरण दिया जाए. क्योंकि अगर सवाल पूछने वाला अधिकारी भी सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक की हैसियत क्या है—यह सोचने का वक्त आ गया है, क्योंकि जब कानून सवालों के कटघरे में खड़ा हो और जवाब देने वाला कोई न हो, तो लोकतंत्र नहीं, खामोश डर पैदा होता है।
