आवाज़ प्लस | विशेष रिपोर्ट
पश्चिम एशिया में एक बार फिर तनाव खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। ईरान और अमेरिका के बीच इस्लामाबाद में हुई वार्ता के विफल होने के बाद अमेरिका ने बड़ा रणनीतिक कदम उठाते हुए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास समुद्री नाकेबंदी लागू करने का ऐलान किया है। 13 अप्रैल से लागू इस फैसले ने पूरे खाड़ी क्षेत्र में भू-राजनीतिक हलचल तेज कर दी है।

अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, यह नाकेबंदी ईरान के सभी प्रमुख बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों पर लागू होगी। इसके तहत ईरानी बंदरगाहों में आने-जाने वाले हर देश के जहाजों की निगरानी और नियंत्रण किया जाएगा। हालांकि, अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि गैर-ईरानी बंदरगाहों की ओर जाने वाले जहाजों की आवाजाही पर कोई रोक नहीं होगी।
जहाजों के लिए सख्त निर्देश जारी
अमेरिकी नौसेना ने खाड़ी क्षेत्र में सक्रिय सभी जहाजों को निर्देश दिया है कि वे ‘Notice to Mariners’ का पालन करें और ऑपरेशन के दौरान अमेरिकी नौसेना से संपर्क बनाए रखें। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य और ओमान की खाड़ी के प्रवेश द्वारों पर ‘ब्रिज-टू-ब्रिज चैनल 16’ के जरिए लगातार संपर्क रखने को कहा गया है।
रणनीतिक दबाव या युद्ध की तैयारी?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ईरान पर दबाव बनाने की अमेरिकी रणनीति का हिस्सा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी नौसेना के पास फारस की खाड़ी में तैनात USS Gerald Ford और USS Abraham Lincoln जैसे अत्याधुनिक युद्धपोत हैं, जो इस क्षेत्र में पूर्ण सैन्य नियंत्रण स्थापित करने में सक्षम हैं।
ईरान की कड़ी चेतावनी
अमेरिकी कदम के जवाब में ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। IRGC ने चेतावनी दी है कि होर्मुज में किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई का जवाब “निर्णायक और विनाशकारी” होगा। ईरान ने दावा किया है कि इस रणनीतिक जलमार्ग पर उसका पूर्ण नियंत्रण है और कोई भी दुश्मन यहां “जानलेवा भंवर” में फंस सकता है।
क्या बढ़ेगा संघर्ष?
स्थिति तेजी से विस्फोटक होती जा रही है। एक ओर अमेरिका समुद्री नाकेबंदी के जरिए ईरान को झुकाने की कोशिश कर रहा है, वहीं ईरान भी आक्रामक रुख अपनाए हुए है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि अगर हालात काबू में नहीं आए, तो यह टकराव बड़े सैन्य संघर्ष का रूप ले सकता है।
वैश्विक असर तय
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्गों में से एक है। यहां तनाव बढ़ने का सीधा असर वैश्विक तेल बाजार, व्यापार और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
होर्मुज पर बढ़ती सैन्य गतिविधियां केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक चिंता का विषय बन चुकी हैं। अब दुनिया की नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या कूटनीति इस संकट को शांत कर पाएगी या फिर यह टकराव एक बड़े युद्ध की ओर बढ़ेगा।
