नई दिल्ली:
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े अहम मामले पर सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संवैधानिक पीठ में सुनवाई जारी है। यह पीठ धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव, धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और संविधान के अनुच्छेद 25 व 26 के दायरे पर गहन विचार कर रही है।

मंगलवार (7 अप्रैल 2026) को हुई पिछली सुनवाई में कोर्ट ने ‘अंधविश्वास’ और सती प्रथा जैसे उदाहरणों का हवाला देते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की। पीठ ने स्पष्ट कहा कि अदालत यह तय करने का अधिकार रखती है कि कोई प्रथा अंधविश्वास की श्रेणी में आती है या नहीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल यह कह देना कि अंतिम फैसला विधायिका का है, पर्याप्त नहीं हो सकता।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि किसी विशेष आयु वर्ग या जेंडर को पूजा स्थल में प्रवेश से रोकना हमेशा भेदभाव नहीं माना जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि अदालतों को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि कोई धार्मिक प्रथा ‘आवश्यक’ है या अंधविश्वास।
इस पर न्यायमूर्ति बागची ने जवाब देते हुए कहा कि तर्क की तार्किकता को परखने के लिए ‘रिडक्टियो एड एब्सर्डम’ जैसे सिद्धांतों का उपयोग किया जाता है, जिससे किसी दलील की सीमाओं को समझा जा सके।
यह मामला न केवल सबरीमाला मंदिर बल्कि देशभर के विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक प्रथाओं की वैधता को लेकर एक व्यापक संवैधानिक बहस का केंद्र बन गया है। आने वाले दिनों में इस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला देश में धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता के बीच संतुलन तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
