नई दिल्ली। केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को भी सुनवाई जारी रही। केंद्र सरकार ने इस दौरान अपना पक्ष रखते हुए धार्मिक परंपराओं के संरक्षण पर जोर दिया और कहा कि इन रीति-रिवाजों को केवल लैंगिक समानता के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र की ओर से दलील पेश करते हुए कहा कि धार्मिक प्रथाएं आस्था पर आधारित होती हैं, न कि भेदभाव पर। उन्होंने अदालत को बताया कि देश में कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं जहां पुरुषों या महिलाओं—दोनों के लिए अलग-अलग नियम लागू होते हैं। इसलिए किसी एक परंपरा को केवल लैंगिक भेदभाव के चश्मे से देखना उचित नहीं है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए केरल के कोट्टनकुलंगारा श्री देवी मंदिर का उल्लेख किया, जहां एक विशेष उत्सव के दौरान पुरुष महिलाओं के वेश में पूजा करते हैं। मेहता ने कहा कि यह भारत की धार्मिक विविधता और परंपराओं की विशिष्टता को दर्शाता है।
सुनवाई के दौरान मेहता ने यह भी कहा कि यह मुद्दा “पुरुष बनाम महिला” का नहीं है, बल्कि आस्था और परंपरा का है। उन्होंने कहा, “यह पुरुष-प्रधान या स्त्री-प्रधान समाज का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह एक स्त्री-प्रधान परंपरा का उदाहरण भी हो सकता है।”
वहीं, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने अदालत से आग्रह किया कि इस मामले में “संवैधानिक नैतिकता” के बजाय “सार्वजनिक नैतिकता” को आधार बनाया जाना चाहिए, ताकि समाज की व्यापक मान्यताओं और धार्मिक स्वतंत्रता का संतुलन बना रहे।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में अपने ऐतिहासिक फैसले में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को 4:1 के बहुमत से असंवैधानिक घोषित कर दिया था। इसके बाद 2019 में इस मुद्दे से जुड़े व्यापक संवैधानिक प्रश्नों को बड़ी पीठ के पास भेज दिया गया था।
अब नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ इस बात पर विचार कर रही है कि धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। इस मामले का फैसला भविष्य में देश के विभिन्न धार्मिक स्थलों में लैंगिक समानता से जुड़े मुद्दों की दिशा तय कर सकता है।
