नफरती भाषण पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: मौजूदा कानून पर्याप्त, नए निर्देशों की जरूरत नहीं

नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने नफरती भाषण (हेट स्पीच) से जुड़े मामलों पर अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि इस मुद्दे से निपटने के लिए मौजूदा आपराधिक कानून पर्याप्त हैं और फिलहाल किसी अतिरिक्त न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई के बाद यह कहा कि यह धारणा गलत है कि नफरती भाषण से निपटने के लिए देश में कोई कानून मौजूद नहीं है।

🔹 विधायिका का क्षेत्राधिकार, अदालत का नहीं

पीठ ने अपने फैसले में साफ किया कि अपराध की परिभाषा तय करना और उसके लिए सजा निर्धारित करना पूरी तरह से विधायिका का अधिकार है। अदालतें कानून की व्याख्या कर सकती हैं, लेकिन नए कानून बनाना या मौजूदा कानूनों का विस्तार करना उनका काम नहीं है।

🔹 संशोधन का विकल्प खुला

अदालत ने यह भी कहा कि बदलती सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए केंद्र सरकार और संसद चाहे तो कानूनों में संशोधन कर सकती है। इसके लिए विधि आयोग की 2017 की 267वीं रिपोर्ट में दिए गए सुझावों पर विचार किया जा सकता है।

🔹 भाईचारे और व्यवस्था से जुड़ा मुद्दा

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि नफरत फैलाने वाले भाषण और अफवाहें सीधे तौर पर समाज में भाईचारा, गरिमा और संवैधानिक व्यवस्था को प्रभावित करती हैं। इसलिए यह गंभीर विषय है, लेकिन इसके समाधान के लिए मौजूदा कानूनी ढांचा सक्षम है।

🔹 कानूनी कार्रवाई के लिए पर्याप्त प्रावधान

पीठ ने बताया कि वर्तमान आपराधिक कानून—जिसमें पूर्ववर्ती IPC और अब लागू नई व्यवस्थाएं जैसे BNSS—ऐसे मामलों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं।
साथ ही, यदि कोई संज्ञेय अपराध सामने आता है तो FIR दर्ज करना पुलिस की अनिवार्य जिम्मेदारी है।

🔹 आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट ने 20 जनवरी को इस मामले में फैसला सुरक्षित रखा था और अब अपना निर्णय सुनाया है। विस्तृत आदेश आने की अभी प्रतीक्षा है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि नफरती भाषण से निपटने के लिए कानूनी ढांचा पहले से मौजूद है। अब जिम्मेदारी कानून लागू करने वाली एजेंसियों और विधायिका पर है कि वे इसे प्रभावी ढंग से लागू करें या जरूरत पड़ने पर संशोधन करें।

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