क्या स्वतंत्र भारत में एक लोकसेवक अप्रत्यक्ष “गुलामी” का दंश झेल रहा है?

विचार-लेख | AWAZ PLUS

लेखक: इं. जय प्रकाश, पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष, राज्य विद्युत परिषद जूनियर इंजिनियर्स संगठन, उ.प्र.
एक समय था जब सरकारी सेवा पाना युवाओं के लिए गौरव, स्थिरता और राष्ट्रसेवा का प्रतीक माना जाता था। कठिन प्रतियोगी परीक्षाएँ पार कर जब कोई युवा लोकसेवक बनता, तो वह क्षण परिवार और समाज के लिए उत्सव जैसा होता। पर आज, व्यवहारिक स्तर पर अनेक लोकसेवक यह महसूस करते हैं कि वे कठोर आचरण नियमों और प्रशासनिक सीमाओं के कारण अपनी पूर्ण क्षमता से राष्ट्रहित में योगदान नहीं दे पा रहे।

प्रश्न की जड़: क्षमता बनाम बंधन

लोकसेवक प्रतिभाशाली है, प्रशिक्षित है, अनुभवी है—फिर भी:
* उसे सार्वजनिक नीति पर खुलकर बोलने की सीमाएँ हैं,
* वैकल्पिक पेशेवर/बौद्धिक भागीदारी पर प्रतिबंध हैं,
* और सबसे बड़ा प्रश्न—वह **नीति-निर्माण की संस्था** में सीधे भागीदारी क्यों नहीं कर सकता?
नीति-निर्माण का केंद्र विधायिका है, पर एक सेवा में रहते हुए लोकसेवक का विधायिका में प्रवेश निषिद्ध है। क्या यह व्यवस्था संतुलित है? या समय के साथ पुनर्विचार योग्य हो चुकी है?

संवैधानिक परिप्रेक्ष्य

भारत का संविधान शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) पर आधारित है—कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका की स्पष्ट सीमाएँ हैं। इसी भावना से:
Representation of the People Act, 1951 और सेवा आचरण नियम यह सुनिश्चित करते हैं कि सरकारी कर्मचारी निष्पक्ष रहें और चुनावी राजनीति से दूर रहें। Central Civil Services (Conduct) Rules, 1964 जैसे नियम राजनीतिक तटस्थता को अनिवार्य करते हैं।
उद्देश्य स्पष्ट है—प्रशासन की निष्पक्षता। पर क्या यह निष्पक्षता, प्रतिभा की भागीदारी को अनावश्यक रूप से सीमित कर रही है?

तर्क—दोनों पक्ष- व्यवस्था के पक्ष में

* प्रशासन राजनीतिक दबाव से मुक्त रहता है।
* निर्णयों में तटस्थता और निरंतरता बनी रहती है।
* सत्ता परिवर्तन का असर प्रशासनिक निष्पक्षता पर कम पड़ता है।

पुनर्विचार के पक्ष में

* अनुभवी लोकसेवक नीति-निर्माण में मूल्यवान दृष्टि दे सकते हैं।
* सेवा में रहते हुए पूर्ण प्रतिबंध, ज्ञान-साझाकरण को सीमित करता है।
* “कूलिंग-ऑफ” या सीमित सहभागिता जैसे मॉडल पर विचार हो सकता है।

क्या समाधान संभव हैं?

* सेवा त्याग के बाद निर्धारित कूलिंग-ऑफ अवधि के साथ विधायिका में प्रवेश।
* नीति विमर्श के लिए गैर-राजनीतिक मंचों पर संस्थागत भागीदारी।
* आचरण नियमों में स्पष्ट, आधुनिक परिभाषाएँ जो ज्ञान-साझाकरण को अनुमति दें पर राजनीतिक निष्पक्षता बनाए रखें।

मूल प्रश्न

क्या वर्तमान ढांचा लोकसेवक की ऊर्जा और अनुभव का पूर्ण उपयोग कर पा रहा है? या समय आ गया है कि निष्पक्षता और भागीदारी के बीच एक नया संतुलन खोजा जाए?
यह लेख सकारात्मक, संवैधानिक और जनहितकारी विमर्श के उद्देश्य से प्रस्तुत है।
AWAZ PLUS पाठकों, लोकसेवकों, विधि-विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं से आग्रह करता है कि वे अपने विचार साझा करें—ताकि एक संतुलित, व्यावहारिक और भविष्य-दृष्टि वाली चर्चा आगे बढ़ सके।
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