निजी एंबुलेंस चालकों का नेटवर्क: मरीजों की जिंदगी पर चल रहा मुनाफे का खेल

लखनऊ समेत उत्तर प्रदेश के कई शहरों में निजी एंबुलेंस सेवाएं फ्लाइट से भी ज़्यादा महंगा किराया वसूल रही हैं, जबकि ये सिर्फ मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक ले जाने का साधन होती हैं – वो भी अक्सर बिना डॉक्टर, दवाइयों या जीवन रक्षक उपकरणों के।

उदाहरण:

  • लखनऊ से दिल्ली की दूरी लगभग 550 किमी है।
  • एयरलाइन से इस दूरी का किराया रिटर्न मिलाकर ₹8,000-₹10,000 तक होता है।
  • वहीं, इसी दूरी के लिए एक प्राइवेट एंबुलेंस का किराया ₹14,000 से ₹22,000 तक है।

कैसे चल रहा है ये सिंडिकेट?

1. कोई किराया तय नहीं

स्वास्थ्य विभाग ने कोविड के दौरान एंबुलेंस सेवाओं के लिए कुछ रेट्स तय किए थे, लेकिन उसके बाद से अब तक किसी ने इन रेट्स को अपडेट या लागू नहीं किया है।
नतीजा: एंबुलेंस चालक मनमाना किराया मांगते हैं। किसी भी मरीज़ के परिजनों की मजबूरी का फायदा उठाया जाता है।

2. दलाली का नेटवर्क (सिंडिकेट)

  • सरकारी अस्पतालों में खड़े ये एंबुलेंस चालक “दलालों” की तरह काम करते हैं।
  • जैसे ही कोई गंभीर मरीज आता है, ये तुरंत परिजनों से संपर्क करते हैं और कहते हैं कि “यहां इलाज नहीं होगा, फलां प्राइवेट अस्पताल ले जाओ।”
  • इसके बदले में निजी अस्पताल इन चालकों को “कमीशन” देता है। यानी मरीजों को जानबूझकर महंगे इलाज वाली जगह भेजा जाता है।

3. जिम्मेदार चुप क्यों हैं?

  • अस्पताल प्रशासन या स्वास्थ्य विभाग जानता है कि अस्पताल गेट पर क्या चल रहा है, लेकिन कार्रवाई नहीं करता।
  • ऐसा भी माना जा रहा है कि कुछ अधिकारियों को भी इसमें हिस्सा मिलता है, इसलिए वे इसे नजरअंदाज करते हैं।

नतीजा क्या होता है?

✅ गरीब मरीज लुटता है:

मरीज के परिजन पहले ही तनाव में होते हैं, ऐसे में:

  • 10-15 किमी के लिए ₹2000 से ₹4000 तक वसूले जाते हैं।
  • अगर मरीज को शहर से बाहर ले जाना हो तो हजारों-हजार वसूले जाते हैं।

✅ जीवन से खिलवाड़:

  • कई बार इन एंबुलेंस में कोई मेडिकल सुविधा नहीं होती।
  • ऑक्सीजन सिलेंडर या trained EMT (Emergency Medical Technician) नहीं होता।
  • यदि मरीज को रास्ते में कोई मेडिकल इमरजेंसी होती है, तो उसकी मौत हो सकती है।

कानूनी और प्रशासनिक पहलू

कोविड के दौरान क्या हुआ था?

  • 2020-21 में कोविड के समय लूट का आलम था।
  • मजबूरी में लोगों को ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए ₹30,000 तक देने पड़े, एंबुलेंस ₹50,000 तक गई।
  • तब सरकार ने एक गाइडलाइन निकाली, जिसमें लिखा गया:
  • 10 किमी तक ₹500
  • हर अतिरिक्त किमी ₹20 से ₹30

लेकिन यह गाइडलाइन सिर्फ कागज पर रह गई।

समाधान क्या हो सकता है?

  1. फिक्स रेट चार्ट जारी हो और हर एंबुलेंस पर चिपकाया जाए।
  2. सरकारी अस्पतालों के बाहर निजी एंबुलेंस की मनमानी रोकी जाए।
  3. ऑनलाइन बुकिंग प्लेटफॉर्म बनाया जाए जहां सरकारी और निजी दोनों रेट पारदर्शी हों।
  4. एंबुलेंस चालकों का वैरिफिकेशन और लाइसेंस अनिवार्य हो।
  5. दलाली करने वाले कर्मियों और अस्पतालों पर कानूनी कार्रवाई की जाए।

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