डीलिमिटेशन बिल के खिलाफ तमिलनाडु में उग्र विरोध, सीएम एम.के. स्टालिन ने फहराया काला झंडा

नमक्कल/चेन्नई | आवाज़ प्लस

डीलिमिटेशन (परिसीमन) बिल को लेकर तमिलनाडु में सियासी तापमान बढ़ गया है। राज्य के मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने गुरुवार को काले कपड़े पहनकर केंद्र सरकार के खिलाफ जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने काला झंडा फहराते हुए प्रस्तावित परिसीमन विधेयक की कॉपी भी जलाई और इसे दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय बताया।

स्टालिन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर तीखा संदेश देते हुए कहा कि यह “काला कानून” तमिलों को उनकी ही जमीन पर हाशिए पर धकेल देगा। उन्होंने दावा किया कि यह विरोध सिर्फ शुरुआत है और पूरे तमिलनाडु में इसकी आग फैलेगी, जो केंद्र सरकार के “घमंड” को तोड़ेगी।

जनता से काले झंडे फहराने की अपील

सीएम स्टालिन ने पार्टी कार्यकर्ताओं और आम जनता से अपने-अपने घरों के सामने काले झंडे फहराकर विरोध दर्ज कराने की अपील की। इससे पहले जारी एक वीडियो संदेश में उन्होंने आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार परिसीमन के जरिए दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी कम करने की साजिश कर रही है।

विपक्ष का तीखा विरोध

प्रस्तावित डीलिमिटेशन बिल को लेकर विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं। हाल ही में केंद्र द्वारा नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 के क्रियान्वयन के लिए ड्राफ्ट अमेंडमेंट को मंजूरी दिए जाने के बाद इस मुद्दे ने और तूल पकड़ लिया है। विपक्ष ने संसद का विशेष सत्र बुलाने की जल्दबाजी पर भी आपत्ति जताई है।

सीटों में बदलाव को लेकर आशंका

तमिलनाडु सरकार के मंत्री अंबिल महेश पोय्यामोझी ने भी इस कदम का विरोध करते हुए कहा कि केंद्र लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 तक करने की योजना बना रहा है। उनके अनुसार, इससे उत्तर भारत के राज्यों—खासतौर पर उत्तर प्रदेश—को अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा, जबकि दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी घट सकती है।

उन्होंने कहा कि “यह राज्यों के अधिकारों को कमजोर करने की कोशिश है। परिसीमन जैसे अहम मुद्दे पर फेडरल स्ट्रक्चर के तहत व्यापक बहस होनी चाहिए, लेकिन अब तक ड्राफ्ट रिपोर्ट विपक्ष के साथ साझा नहीं की गई है।”

राजनीतिक टकराव तेज

डीलिमिटेशन को लेकर केंद्र और दक्षिणी राज्यों के बीच टकराव अब खुलकर सामने आ गया है। जहां केंद्र इसे जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व का मुद्दा बता रहा है, वहीं तमिलनाडु सहित कई राज्य इसे अपने राजनीतिक अधिकारों में कटौती के रूप में देख रहे हैं।

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