जिस धरती से रामराज्य की स्थापना के दावे होते हैं, उसी राजधानी लखनऊ में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि 30 किलोवाट की बिजली चोरी पकड़े जाने के बाद भी पूरा मामला “हजम” कर लिया गया। हैरत की बात यह है कि चेकिंग का वायरल वीडियो मौजूद है, फिर भी न तो प्राथमिकी दर्ज हुई, न ही विभागीय रिपोर्ट आगे बढ़ी।
सेस-2 खंड अंतर्गत एफसीआई उपकेंद्र के तत्कालीन उपखंड अधिकारी इंजीनियर संतोष पाठक पर बुद्धेश्वर स्थित कुमार मेडिकल स्टोर में 30 किलोवाट की बिजली चोरी पकड़ने के बाद ₹2 लाख रिश्वत लेकर मामला रफा-दफा करने का गंभीर आरोप लगा है।

सूत्रों के अनुसार, चेकिंग टीम में तत्कालीन उपखंड अधिकारी संतोष पाठक के साथ लाइनमैन विजय पटेल समेत कई कर्मचारी शामिल थे। वायरल वीडियो में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि स्वयं इंजीनियर संतोष पाठक पूरे परिसर की जांच करते हुए विद्युत खपत की गणना कर रहे हैं और मौके पर चोरी पकड़े जाने की बात भी स्वीकार करते नजर आ रहे हैं।
इसके बावजूद बड़ा सवाल यह है कि—
- चेकिंग के बाद संबंधित अधिकारियों को रिपोर्ट क्यों नहीं भेजी गई?
- यदि सब कुछ सामान्य था तो रिपोर्ट में सामान्य दर्शाया क्यों नहीं गया?
- जब वीडियो में स्वयं अधिकारी चोरी पकड़े जाने की बात कह रहे हैं, तो प्राथमिक रिपोर्ट क्यों नहीं दर्ज कराई गई?
- विभाग को गुमराह कर पूरा प्रकरण गुमनामी के अंधेरे में क्यों धकेल दिया गया?
सूत्रों का दावा है कि ₹2 लाख लेकर मामला दबा दिया गया। अगर ऐसा नहीं था तो विभागीय स्तर पर अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
AWAZ PLUS के पास मौजूद वीडियो सबूत साफ इशारा कर रहे हैं कि 30 किलोवाट की बिजली चोरी पकड़ी गई थी। इसके बावजूद न एफआईआर, न विभागीय नोटिस, न ही कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई — आखिर किसके संरक्षण में यह खेल चल रहा है?
सवाल यह भी है कि—
- क्या विभाग की नजर में 30 किलोवाट की बिजली चोरी और ₹2 लाख की रिश्वत कोई छोटी बात है?
- या फिर भ्रष्टाचार के इस तंत्र में “बिभीषण” तभी सामने आता है, जब उसका हिस्सा नहीं मिलता?
रामराज्य के दावों के बीच राजधानी लखनऊ में उजागर हुआ यह मामला पूरे विद्युत विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। अब देखना यह है कि वीडियो सबूतों के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होती है या यह प्रकरण भी फाइलों में दफन होकर रह जाएगा।
