BRICS शिखर सम्मेलन में पुतिन की भारत यात्रा संभव, भारत-रूस रिश्तों को मिलेगी नई मजबूती

आवाज़ प्लस | अंतरराष्ट्रीय समाचार

नई दिल्ली/मॉस्को: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सितंबर 2026 में भारत की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में शामिल होने आ सकते हैं। क्रेमलिन सूत्रों के मुताबिक पुतिन की यह यात्रा लगभग एक साल के भीतर उनकी दूसरी भारत यात्रा होगी, जो दोनों देशों के मजबूत होते रणनीतिक रिश्तों का संकेत है।

भारत इस वर्ष BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और 18वें शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह सम्मेलन संभावित रूप से 12-13 सितंबर को आयोजित किया जाएगा। भारत इससे पहले 2012, 2016 और 2021 में भी इस मंच की मेजबानी कर चुका है।

क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने पुष्टि करते हुए कहा कि राष्ट्रपति पुतिन “निश्चित रूप से” इस सम्मेलन में भाग लेंगे। रूसी समाचार एजेंसी TASS ने भी इस खबर की पुष्टि की है। भारत की ओर से उन्हें औपचारिक निमंत्रण भेजा जा चुका है।

BRICS का बढ़ता दायरा और महत्व
BRICS समूह में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे प्रमुख उभरते अर्थव्यवस्था वाले देश शामिल हैं। हाल के वर्षों में इस संगठन का विस्तार हुआ है, जिससे इसकी वैश्विक भूमिका और प्रभाव बढ़ा है। यह मंच वैश्विक आर्थिक सहयोग, व्यापार, बहुपक्षीय सुधार और भू-राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा का अहम केंद्र बन चुका है।

भारत की अध्यक्षता का थीम “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” रखा गया है, जो लोगों-केंद्रित और मानवता-प्रथम दृष्टिकोण को दर्शाता है।

भारत-रूस रिश्तों को मिलेगा नया आयाम
पुतिन की प्रस्तावित यात्रा से भारत और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूती मिलने की उम्मीद है। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, रक्षा, व्यापार और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में पहले से गहरा सहयोग है।

इससे पहले दिसंबर 2025 में भी पुतिन भारत आए थे, जहां उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के साथ वार्षिक शिखर बैठक में भाग लिया था। अब BRICS सम्मेलन में उनकी भागीदारी से न केवल द्विपक्षीय संबंध मजबूत होंगे, बल्कि वैश्विक मंच पर ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज को भी बल मिलेगा।

वैश्विक अनिश्चितताओं, ऊर्जा संकट और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच यह शिखर सम्मेलन विशेष महत्व रखता है। नई दिल्ली में होने वाली यह बैठक उभरती अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक नीति-निर्माण में अपनी भूमिका और प्रभाव बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करेगी।

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