नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी (AAP) के सात राज्यसभा सांसदों के Bharatiya Janata Party (BJP) में शामिल होने के बाद देश की सियासत में हलचल तेज हो गई है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर दल-बदल विरोधी कानून को लेकर गंभीर संवैधानिक बहस छेड़ दी है।

राज्यसभा में Aam Aadmi Party (AAP) के कुल 10 सांसद हैं, जिनमें से 7 के अलग होने से दो-तिहाई का आंकड़ा पूरा होता है। यही तथ्य इस मामले को कानूनी रूप से बेहद अहम बना देता है।
क्या कहती है संविधान की दसवीं अनुसूची?
विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) दलबदल को रोकने के लिए बनाई गई थी। लेकिन इसमें एक महत्वपूर्ण अपवाद भी है—यदि किसी विधायी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य अलग होकर किसी अन्य दल में विलय कर लेते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से छूट मिल जाती है।
वरिष्ठ अधिवक्ताओं Mukul Rohatgi, Neeraj Kishan Kaul और Maninder Singh का कहना है कि दसवीं अनुसूची की धारा 4(2) के तहत ऐसा विलय वैध माना जाता है और ऐसे सांसदों पर दल-बदल कानून लागू नहीं होता।
सिंघवी का अलग नजरिया
हालांकि, वरिष्ठ अधिवक्ता Abhishek Manu Singhvi (एएम सिंघवी) इस व्याख्या से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि केवल विधायिका दल का विलय पर्याप्त नहीं है, बल्कि मूल राजनीतिक दल का विलय भी आवश्यक होना चाहिए।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि Supreme Court of India पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि “विधायी दल” और “राजनीतिक दल” दो अलग-अलग इकाइयां हैं।
स्पीकर की भूमिका पर सवाल
सिंघवी ने इस प्रक्रिया में स्पीकर की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि दलबदल से जुड़े मामलों में अंतिम निर्णय सदन के स्पीकर द्वारा लिया जाता है, जो आमतौर पर सत्ताधारी दल से जुड़ा होता है। ऐसे में निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े होते हैं और अयोग्यता तय करना जटिल हो जाता है।
क्या बच जाएंगे सांसद?
Neeraj Kishan Kaul के अनुसार, यदि दो-तिहाई सदस्य विलय को स्वीकार कर लेते हैं, तो यह अयोग्यता से बचने का एक वैध आधार बन सकता है। उन्होंने शिवसेना से जुड़े मामले का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसे मामलों में धारा 4(2) को मान्यता दी है।
वहीं Mukul Rohatgi और Maninder Singh का मानना है कि राज्यसभा में यदि किसी दल के दो-तिहाई सदस्य दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते हैं, तो इसे वैध विलय माना जाएगा और सांसदों को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
AAP के सात सांसदों का BJP में जाना केवल राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि एक संवैधानिक परीक्षा भी बन गया है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इस पूरे मामले में स्पीकर क्या फैसला लेते हैं और क्या यह मामला न्यायालय तक पहुंचता है।
(आवाज़ प्लस के लिए विशेष रिपोर्ट)
